Aryabhatta Story in Hindi | आर्यभट्ट की कहानी

मोरल स्टोरीज इन हिंदी (Moral Stories in Hindi) में आपका स्वागत है। दोस्तों, आज जो कहानी सुनाने जा रहा हूं उसका नाम है Aryabhatta Story in Hindi – आर्यभट्ट की कहानी । यह एक प्रतिभाशाली शिक्षक का कहानी है….आशा करता हूं कि आपको बेहद पसंद आयेगा। तो चलिए शुरू करते है Aryabhatta Story in Hindi

Aryabhatta Story in Hindi | आर्यभट्ट की कहानी

आज विज्ञान की वजह से हम सब यह जानते हैं कि धरती गोल है और वह सूरज से एक निश्चित दूरी पर घूमती है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार यह सिद्धांत निकोलस कॉपरनिकस ने दिया था मगर इस बात को कम ही लोग जानते हैं कि निकोलस कॉपरनिकस से लगभग १००० साल पहले ही भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने यह खोज कर ली थी। आर्यभट्ट की गिनती प्राचीन समय के महान खगोलशास्त्रीयों और गणितज्ञों में की जाती है। उनका जन्म ४७६ ईसवी में हुआ था।

आर्यभट्ट (Aryabhatta) की गिनती प्राचीन समय के महान खगोलशास्त्रीयों और गणितज्ञों में की जाती है. विज्ञान और गणित के क्षेत्र में, आर्यभट द्वारा किए गए कार्य आज भी वैज्ञानिकों को प्रेरणा देते हैं। आज विज्ञान की वजह से हम सब यह जानते हैं कि धरती गोल है, और वह सूरज से एक निश्चित दूरी पर घूमती है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, यह सिद्धांत निकोलस कॉपरनिकस ने दिया था, मगर इस बात को कम ही लोग जानते है कि निकोलस कॉपरनिकस से लगभग १००० साल पहले ही, आर्यभट्ट ने यह खोज कर ली थी।

आर्यभट्ट का कहना था, “यथार्थ और मिथ्या ज्ञान के समुद्र में से मैंने यथार्थ ज्ञान के डूबे हुए रत्न को ब्रह्म के प्रसाद से, अपनी बुद्धि रूपी नावं की सहायता से बाहर निकाला है।”

आर्यभट्ट के जन्म स्थान को लेकर आज भी कई विवाद हैं। एक मान्यता के अनुसार यह कहा गया है कि भगवान बुद्ध के समयकाल में अश्मक देश के कुछ लोग मध्य भारत में नर्मदा नदी और गोदावरी नदी के बीच बस गये, और आर्यभट्ट का जन्म भी इसी स्थान पर हुआ। आर्यभट्ट के जन्म स्थान की दूसरी मान्यता के अनुसार उनका जन्म पाटलिपुत्र के समीप स्थित कुसुमपुर में माना गया है।

आर्यभट्ट की शिक्षा के संबंध में इतिहासकारों के पास, पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं हैं परन्तु एक मान्यता के अनुसार, गुप्त साम्राज्य के आखिरी दिनों में वे नालन्दा विश्वविद्यालय से जुड़े थे। गुप्तकाल को लोग आज भी भारत के स्वर्णिम युग के रूप में देखते हैं। उस समय भारत ने साहित्य, कला और विज्ञान के क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की।

ऐसा कहा जाता है कि मगध स्थित नालन्दा विश्वविद्यालय ज्ञानदान का प्रमुख और प्रसिद्ध केंद्र था। देश विदेश से विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए यहाँ आते थे। नालन्दा विश्वविद्यालय में खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।

एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति यानि chancellor भी थे। आर्यभट्ट का मानना था कि पृथ्वी का आकार गोल है और वह अपनी धुरी पर घूमती है और इसी वजह से दिन और रात का अस्तित्व है।

कई अंधविश्वासों को उनके द्वारा चुनौती दी गई, और उन्होंने, उन्हें गलत साबित करने के लिए, कई वैज्ञानिक कारण, प्रस्तुत किए। हिन्दू मान्यता के अनुसार, राहु नामक ग्रह द्वारा सूर्य या चन्द्रमा को निगल जाने के कारण सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण होते हैं। आर्यभट्ट ने इस धारणा को गलत सिद्ध किया और उन्होंने सूर्य ग्रहण एवं चन्द्र ग्रहण का वैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया।

उन्होंने बताया कि चंद्रमा एवं अन्य ग्रह सूर्य के प्रकाश के परावर्तित होने के कारण प्रकाशमान होते है और वास्तव में, उनका अपना कोई प्रकाश नहीं होता। आर्यभट्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रहण या तो पृथ्वी पर पड़ने वाली छाया हैं या पृथ्वी की ही छाया है। आर्यभट्ट ने पृथ्वी की एक परिक्रमा का बिल्कुल उचित समय ज्ञात किया।

यह अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा प्रतिदिन २४ घंटों में नहीं बल्कि २३ घंटें, ५६ मिनट और ४.१ सेकेण्ड में पूरी कर लेती है। इस प्रकार, हमारे १ साल में ३६५ दिन, ६ घंटे, १२ मिनट और ३० सेकेंड होते हैं। गणित में आर्यभट्ट के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि वे आर्यभट्ट ही थे जिन्होंने पाई के मूल्य का सटीक अनुमान लगाया था।

उन्होंने त्रिकोण और वृत्त के क्षेत्रफ़ल की गणना के लिए भी सही सूत्र खोज निकाले। उन्होंने table of Sines के गठन में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्यभट्ट का स्थान मूल्य प्रणाली का निर्धारण करने और शून्य की खोज करने में सराहनीय योगदान रहा। वे स्थान मूल्य प्रणाली में, शून्य का प्रयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे।

आर्यभट्ट ने अपने जीवन में आर्यभटीय, दशगीतिका, तंत्र और आर्यभट्ट्ट सिद्धांत जैसी कई पुस्तकों की रचना की। उनका भारत और विश्व के गणित और ज्योतिष सिद्धान्त पर गहरा प्रभाव रहा है।

आर्यभट्ट द्वारा सुझाई गई खगोलीय गणना और अनुमानों को आज भी एक विशेष दर्जा दिया गया है क्योंकि उनके समय में किसी प्रकार के आधुनिक उपकरण या साधन नहीं थे। उ नके पास अत्यंत तेज़ दिमाग था, और अपने समर्पण और कड़ी मेहनत से उन्होंने सौर मंडल के विभिन्न रहस्यों को सुलझाने में जो योगदान दिया उसे हमेशा याद रखा जाएगा।

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